जर्जर आंगनबाड़ी भवन की शिकायत के बाद लीपापोती का आरोप: अधिकारी एक-दूसरे पर डाल रहे जिम्मेदारी, सवाल—भवन गिरा तो जवाबदेह कौन?
आजाद भारत न्यूज़ दुर्ग(झुग्गीपारा)
कुंदरापारा के आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक 155 का मामला: सुपरवाइजर ने कहा- बरसात में केंद्र नहीं खोलने दिया, सतनाम भवन में बैठाते हैं; पार्षद बोले- पूरे क्षेत्र की आंगनबाड़ियों की हालत खराब, प्रस्ताव भेजने के बावजूद सुधार नहीं।

दुर्ग। कुंदरापारा, पोटियाकला वार्ड क्रमांक 54 स्थित आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक 155 के जर्जर भवन को लेकर शिकायत के बाद अब विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर मामले में समाधान करने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए मामले की लीपापोती करने में लगे हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, केंद्र का भवन लंबे समय से जर्जर स्थिति में है। छत और भवन के अन्य हिस्सों की स्थिति ऐसी है कि किसी भी समय दुर्घटना की आशंका बनी हुई है। बारिश के दौरान भवन के भीतर पानी भरने और अंधेरा रहने की बात भी सामने आई है। इसके बावजूद शिकायत के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से स्थायी समाधान की जगह अलग-अलग स्पष्टीकरण दिए जा रहे हैं।
“सिर्फ बरसात में समस्या होती है” — शिकायतकर्ता को मिला जवाब
शिकायतकर्ता का कहना है कि जब इस मामले को अधिकारियों के सामने रखा गया तो समस्या को गंभीरता से लेने के बजाय यह कहा गया कि समस्या केवल बरसात के समय होती है।
सवाल यह है कि यदि किसी आंगनबाड़ी भवन की छत जर्जर है और उसके गिरने की आशंका है, तो क्या केवल बारिश के मौसम में ही बच्चों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है? जर्जर भवन की संरचनात्मक स्थिति का तकनीकी परीक्षण कराए बिना उसे सुरक्षित मानना आखिर कितना उचित है?
सुपरवाइजर का दावा—“मैंने केंद्र खोलने से मना किया है”
मामले में आंगनबाड़ी सुपरवाइजर की ओर से शिकायतकर्ता को बताया गया कि उन्होंने केंद्र खोलने से मना किया है और बच्चों को सतनाम भवन में बैठाया जाता है। साथ ही स्कूल में भी व्यवस्था होने की बात कही गई।
लेकिन शिकायतकर्ता का कहना है कि जब मौके पर स्कूल परिसर की स्थिति देखी गई तो वहां कोई बच्चा दिखाई नहीं दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि विभागीय रिकॉर्ड में बच्चों के संचालन और वास्तविक स्थिति में कितना अंतर है?
यदि वास्तव में जर्जर भवन में केंद्र संचालित नहीं किया जा रहा है, तो विभाग को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि—
बच्चों को वर्तमान में कहां बैठाया जा रहा है?
वैकल्पिक भवन की सुरक्षा और उपयुक्तता की जांच किस अधिकारी ने की?
केंद्र वहां से कब से संचालित हो रहा है?
बच्चों की उपस्थिति का रिकॉर्ड कहां है?
क्या विभाग ने जर्जर भवन को खाली कराने का लिखित आदेश जारी किया है?
पार्षद बोले—“मेरे क्षेत्र की सभी आंगनबाड़ियों की हालत खराब”
इस मामले में स्थानीय पार्षद का बयान भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। पार्षद के अनुसार, उनके क्षेत्र की कई आंगनबाड़ियों की स्थिति खराब है। उनके द्वारा बैठकों में लगातार इस विषय को उठाया गया है और प्रस्ताव भी भेजे गए हैं, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
पार्षद का कहना है कि जनप्रतिनिधि के तौर पर वे समस्या को लिखकर और प्रस्ताव भेजकर विभाग तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन उसके बाद संबंधित विभाग को कार्रवाई करनी चाहिए।
यह बयान यदि सही है तो सवाल केवल एक आंगनबाड़ी केंद्र का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में आंगनबाड़ी भवनों के रखरखाव और विभागीय निगरानी व्यवस्था का बन जाता है।



परियोजना अधिकारी और सुपरवाइजर के निरीक्षण पर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने आंगनबाड़ी केंद्रों के नियमित निरीक्षण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि परियोजना अधिकारी द्वारा नियमित रूप से मौके का दौरा नहीं किया जाता और सुपरवाइजर की निगरानी व्यवस्था भी प्रभावी नजर नहीं आती।
शिकायतकर्ता के अनुसार, जब सुपरवाइजर से फोन पर यह पूछा गया कि वे आंगनबाड़ी केंद्रों का दौरा कब-कब करती हैं, तो कथित तौर पर जवाब मिला—“आपको क्यों बताएं? जब जाते हैं तो जरूर बता पाएंगे।”
यदि बातचीत में ऐसा ही जवाब दिया गया है तो यह विभागीय निरीक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। निरीक्षण केवल कागजों में दर्ज होने के बजाय वास्तव में मौके पर हो रहा है या नहीं, इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
“सभी कार्यकर्ताओं को निर्देश देकर चले जाते हैं” — निरीक्षण व्यवस्था पर आरोप
शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि निरीक्षण के दौरान सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को आवश्यक निर्देश देकर अधिकारी वापस चले जाते हैं और जमीनी समस्याओं की वास्तविक स्थिति की पर्याप्त जांच नहीं होती।
ऐसे में सवाल है कि यदि नियमित निरीक्षण वास्तव में हो रहे हैं तो जर्जर भवन, पानी भरने, बच्चों की अनुपस्थिति और केंद्र संचालन की अनियमितताओं जैसी समस्याएं अधिकारियों की नजर में क्यों नहीं आईं?


सबसे बड़ा सवाल—भवन गिरा तो जिम्मेदार कौन?
यह पूरा मामला आखिरकार एक बेहद गंभीर सवाल पर आकर टिकता है—
अगर जर्जर आंगनबाड़ी भवन अचानक गिर गया और किसी बच्चे या कर्मचारी की जान चली गई, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या जिम्मेदारी तब तय होगी जब कोई दुर्घटना हो जाएगी?
या उससे पहले ही भवन का तकनीकी परीक्षण, बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था और नए भवन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी?
आंगनबाड़ी केंद्रों में छोटे बच्चे आते हैं। इसलिए सुरक्षा के मामले में “बरसात में ही समस्या होती है” जैसे तर्क पर्याप्त नहीं हो सकते। भवन की वास्तविक स्थिति का तकनीकी परीक्षण कराकर यह तय करना जरूरी है कि वह बच्चों के बैठने के लिए सुरक्षित है या नहीं।

कागजी कार्रवाई नहीं, चाहिए जमीनी समाधान
स्थानीय जनप्रतिनिधि द्वारा बार-बार प्रस्ताव भेजे जाने, शिकायतकर्ता द्वारा अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किए जाने और भवन की जर्जर स्थिति सामने आने के बाद अब विभाग को स्पष्ट जवाब देना चाहिए कि केंद्र क्रमांक 155 के संबंध में अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
जरूरत है कि—
तत्काल भवन का तकनीकी निरीक्षण हो, जर्जर भवन में बच्चों का प्रवेश पूरी तरह रोका जाए, सुरक्षित वैकल्पिक स्थान पर केंद्र संचालित किया जाए और नवीन आंगनबाड़ी भवन के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए।
साथ ही परियोजना अधिकारी और सुपरवाइजर द्वारा क्षेत्र की आंगनबाड़ियों के किए गए निरीक्षण की तारीखवार जांच होनी चाहिए। निरीक्षण रजिस्टर, बच्चों की उपस्थिति, वैकल्पिक केंद्र में संचालन तथा विभागीय निर्देशों की भी जांच की जाए।
क्योंकि सवाल किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराने से पहले यह है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
अब विभाग को कागजों में कार्रवाई दिखाने के बजाय मौके पर कार्रवाई करके बताना होगा।
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