भालू घर में घुसा, बाघ सड़क पर दिखा… सवाल जानवरों का नहीं, जंगल के उजड़ने का है
जीपीएम में वन्यजीव ‘आतंक’ नहीं, चेतावनी बनकर सामने आ रहे हैं।
GPM-गौरेला पेंड्रा मरवाही- आजाद भारत न्यूज़-
जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही इन दिनों सुर्खियों में है। कभी बाघ दिखने की खबर, कभी भालू से दहशत, कभी हिरण सड़क पार करता नजर आता है और हाल ही में हनी बैजर तक की मौजूदगी की चर्चा। मीडिया की हेडलाइन तैयार है— “बाघ का आतंक”, “भालू से खौफ”—लेकिन असली मुद्दा अब भी हाशिये पर है।

बीती रात ग्राम पंचायत भस्कुरा के खोलीटोला में भालू अमरलाल मांझी के घर के पास पहुंच गया। अचानक हुई इस घटना से पूरे टोले में अफरा-तफरी मच गई। लोग घरों से बाहर निकल आए, बच्चों और बुजुर्गों को सुरक्षित किया गया और रात डर के साए में बीती। सूचना मिलते ही सामाजिक कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे, ग्रामीणों को सतर्क रहने की समझाइश दी गई और वन विभाग को सूचना दी गई।
लेकिन यह घटना अकेली नहीं है—यह एक संकेत है
जीपीएम जिला अचानकमार टाइगर रिजर्व से सटा हुआ है। यह इलाका वन्यजीवों का प्राकृतिक गलियारा है—उनका रास्ता, उनका घर। ऐसे में अगर बाघ, भालू या अन्य जीव यहां दिखते हैं, तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “वे बस्ती में क्यों आए?”
सवाल यह होना चाहिए कि “उन्हें जंगल छोड़ने पर मजबूर किसने किया?”
जंगल कट रहे हैं। अवैध खनन की चर्चाएं आम हैं। ब्लास्टिंग से जमीन कांप रही है। मशीनों का शोर जंगल की शांति निगल रहा है। पेड़ों की जड़ें कमजोर हो रही हैं, जल-स्रोत सूख रहे हैं। जब जंगल का सुरक्षित दायरा सिमटेगा, तो वन्यजीव बाहर आएंगे ही।

भालू अगर घर के पास दिखा, तो वह हमला करने नहीं आया—वह रास्ता भटक गया है। उसका रास्ता हमने काट दिया।
बाघ अगर सड़क पार करता दिखा, तो वह आतंक नहीं फैला रहा—वह अपने पुराने गलियारे को ढूंढ रहा है।
यहां जरूरत है दहशत की नहीं, दृष्टि की।
पत्रकारिता का काम डर बेचने की हेडलाइन बनाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि जंगल क्यों असुरक्षित हो रहा है।
प्रशासन का काम बयान देना नहीं, बल्कि अवैध खनन पर सख्त रोक, ब्लास्टिंग की निगरानी और वन गलियारों की स्पष्ट पहचान व सुरक्षा करना है।
बाघ, भालू, हिरण समस्या नहीं हैं।
ये चेतावनी हैं—कि प्रकृति दबाव में है।
आज खबर है—भालू घर में घुसा।
कल खबर होगी—जंगल खत्म हो गया।
अभी भी समय है।
दहशत की हेडलाइन छोड़िए, जंगल बचाने की खबर लिखिए।
क्योंकि जंगल बचेगा, तो वन्यजीव भी सुरक्षित रहेंगे—और इंसान भी।
सामाजिक कार्यकर्ता क्या कहते है-
हाथी व वन्यजीव संरक्षण के लिए कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता किशन ने कहा कि वन्यजीव–मानव द्वंद को दहशत नहीं, समझ और योजना से सुलझाने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि जागरूकता और इंसानियत ही इसका सबसे बड़ा समाधान है। बच्चों से संवाद, जंगलों का संरक्षण और संवर्धन अति आवश्यक है। जीपीएम और बिलासपुर जिलों में बढ़ती आबादी और जंगलों में बढ़ता हस्तक्षेप चिंता का विषय है, इसलिए समय रहते जंगलों को सुरक्षित करना जरूरी है।



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