आदिवासी अंचल की शालाओं में अव्यवस्था का आलम, शिक्षक नदारद, बच्चों का भविष्य अधर में
खोंगसरा(कोटा),बिलासपुर,छत्तीसगढ़ 18 जून 26
कोटा। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत और शाला प्रवेशोत्सव के उत्साह के बीच कोटा विकासखंड के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों की कई शालाओं में शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर चिंताजनक नजर आ रही है। विद्यालयों में शिक्षकों की अनुपस्थिति, अव्यवस्थित शैक्षणिक माहौल, बच्चों के प्रवेश की धीमी प्रक्रिया तथा विभागीय मॉनिटरिंग के अभाव ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार शासकीय प्राथमिक शाला तुमाडबरा में पदस्थ सहायक शिक्षक भोजराज पैकरा शाला प्रवेशोत्सव के दिन भी विद्यालय नहीं पहुंचे और आज 18 जून भी अनुपस्थित पाए गए। स्थानीय ग्रामीणों और पालकों का आरोप है कि उनका निवास पेंड्रा में होने के कारण वे अक्सर विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले शैक्षणिक सत्र में भी उनकी उपस्थिति को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन विभाग द्वारा कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
वहीं इसी विद्यालय में पदस्थ सहायक शिक्षिका तृप्ति बुढेक भी बिलासपुर से उस दिन सीधे शाला आयी थी। बताया जा रहा है कि वे आज लगभग सुबह 10:30 बजे विद्यालय पहुंचीं। विद्यालय पहुंचने पर शाला परिसर में अव्यवस्था का माहौल दिखाई दिया। शिक्षण सामग्री इधर-उधर बिखरी हुई थी, पाठ्यपुस्तकों का समुचित प्रबंधन नहीं था तथा कक्षाओं में शैक्षणिक वातावरण भी नजर नहीं आया। नए सत्र के प्रारंभ होने के बावजूद विद्यालय में आवश्यक तैयारियां अधूरी दिखाई दीं। दूसरे शिक्षक से सहयोग नही मिलना बताया गया।
इसी प्रकार शासकीय प्राथमिक शाला गौरखुरी में पदस्थ शिक्षक रामहरे सिदार मरकाम भी विद्यालय में उपस्थित नहीं मिले। इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने स्वयं को अवकाश पर होना बताया। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि सत्र प्रारंभ होने के समय शिक्षकों की अनुपस्थिति से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
ग्रामीणों और पालकों ने बताया कि अब तक कई बच्चों का प्रवेश कार्य पूरा नहीं हुआ है। शाला प्रवेशोत्सव के बाद भी पालकों को पर्याप्त सूचना नहीं दी गई है। विद्यालयों में गणवेश वितरण प्रारंभ नहीं हुआ है और अधिकांश बच्चों को पाठ्यपुस्तकें भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। ऐसे में नए शैक्षणिक सत्र की पढ़ाई सुचारू रूप से प्रारंभ होना मुश्किल दिखाई दे रहा है।

सबसे गंभीर बात यह सामने आई है कि संबंधित संकुल समन्वयक द्वारा नियमित निरीक्षण और मॉनिटरिंग नहीं किए जाने के आरोप भी लग रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय-समय पर विद्यालयों का निरीक्षण किया जाता तो शिक्षकों की अनुपस्थिति और अव्यवस्थाओं पर अंकुश लगाया जा सकता था। मॉनिटरिंग के अभाव में दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों की शालाओं में शिक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे संचालित होती नजर आ रही है।

शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सरकारी दावों के बीच आदिवासी अंचल की इन शालाओं की स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है। पालकों और ग्रामीणों ने जिला शिक्षा अधिकारी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी तथा उच्च अधिकारियों से मामले की जांच कर दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई करने और विद्यालयों में नियमित शिक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
बीईओ ने कहा- जानकारी दें, होगी कार्रवाई
जब इस संबंध में विकासखंड शिक्षा अधिकारी कोटा गोपाल दुबे से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि “आपके माध्यम से जानकारी मिली है। मीडिया ने जो भी तथ्य और स्थिति देखी है, उसे प्रकाशित करें तथा उसका विवरण मुझे उपलब्ध कराएं। मामले की जांच कर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी।”
बीईओ के इस बयान के बाद अब स्थानीय लोगों और पालकों को उम्मीद है कि आदिवासी अंचल की शालाओं में शिक्षकों की अनुपस्थिति, अव्यवस्था और शैक्षणिक गतिविधियों में लापरवाही जैसे मामलों की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि शिक्षा विभाग समय पर निरीक्षण और निगरानी सुनिश्चित करे तो दूरस्थ क्षेत्रों की शालाओं में व्याप्त समस्याओं का समाधान हो सकता है तथा बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लाभ मिल सकेगा।
आजाद भारत न्यूज़ द्वारा उठाए गए इस मुद्दे पर अब सभी की निगाहें शिक्षा विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
क्या कहते हैं जनप्रतिनिधि
आदिवासी अंचल की शालाओं में सामने आई अव्यवस्थाओं और शिक्षकों की अनुपस्थिति को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी चिंता व्यक्त की है तथा शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता बताई है।
ग्राम पंचायत टाटीधार के सरपंच प्रतिनिधि सम्मार सिंह ने कहा कि, “बैगा क्षेत्र के विकास और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। शिक्षकों को नियमित रूप से विद्यालय आकर बच्चों को पढ़ाना चाहिए। शिक्षकों के नहीं आने की जानकारी मिली है। मैं स्वयं विद्यालय जाकर स्थिति का निरीक्षण करूंगा और आवश्यक पहल करूंगा।”
वहीं ग्राम पंचायत खोंगसरा के जनप्रतिनिधि धीरंत यादव ने कहा कि, “पढ़ना-लिखना हर बच्चे के लिए जरूरी है, विशेषकर छोटे बच्चों के लिए, क्योंकि यही उनकी शिक्षा की नींव होती है। ऐसे में विद्यालय समय पर खुलें, पूरे समय संचालित हों और बच्चों को नियमित शिक्षा मिले, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।”
जनप्रतिनिधियों के इन बयानों से स्पष्ट है कि स्थानीय स्तर पर भी शिक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बनी हुई है। ग्रामीणों का मानना है कि दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों की नियमित उपस्थिति, प्रभावी मॉनिटरिंग और विभागीय जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।


अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेते हुए आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाता है।
– आजाद भारत न्यूज़
कोटा, बिलासपुर
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