“सरगुजिहा बोलने पर मासूम को नहीं मिला प्रवेश: नई शिक्षा नीति 2020 की धज्जियां उड़ाते निजी स्कूल पर कार्रवाई”
अंबिकापुर में भाषा के आधार पर भेदभाव, DEO ने जांच के बाद लगाया 1 लाख का जुर्माना, स्कूल संचालन भी हुआ स्थगित
अंबिकापुर, सरगुजा | 18 अप्रैल 2026-आजाद भारत
नई शिक्षा नीति 2020 जहां बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देने पर विशेष जोर देती है, वहीं सरगुजा जिले के अंबिकापुर में इसका उल्टा देखने को मिला। यहां एक निजी स्कूल द्वारा एक मासूम बच्चे को सिर्फ इसलिए प्रवेश देने से मना कर दिया गया क्योंकि वह हिंदी नहीं बल्कि अपनी स्थानीय भाषा ‘सरगुजिहा’ में बात करता है।
यह मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हुआ और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। शिकायत के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) अंबिकापुर द्वारा तत्काल जांच के आदेश दिए गए।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, अंबिकापुर स्थित एक निजी स्कूल स्वर्ग किड्स एकेडमी (पशानी एजुकेशन सोसायटी) में एक लगभग 4 वर्षीय बच्चे के अभिभावक ने प्रवेश के लिए संपर्क किया।
लेकिन स्कूल प्रबंधन ने यह कहते हुए प्रवेश देने से इंकार कर दिया कि बच्चा हिंदी में बात नहीं कर पाता और केवल सरगुजिहा भाषा बोलता है।
इतना ही नहीं, अभिभावक के अनुसार स्कूल की ओर से यह भी कहा गया कि
“यहां बड़े घरों के बच्चे पढ़ते हैं, आपका बच्चा सरगुजिहा बोलता है, वह यहां एडजस्ट नहीं कर पाएगा।”
यह कथन न केवल भाषा के आधार पर भेदभाव को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक असमानता की सोच को भी उजागर करता है।

जांच में क्या सामने आया?
जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा गठित जांच टीम ने पूरे मामले की जांच की।
जांच में पाया गया कि:
स्कूल ने भाषा के आधार पर प्रवेश से इंकार किया
यह कृत्य निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (RTE Act) के प्रावधानों का उल्लंघन है
साथ ही यह नई शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना के भी विपरीत है
जांच रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट हुआ कि स्कूल प्रबंधन ने अपनी गलती स्वीकार की है।
क्या कार्रवाई हुई?
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने सख्त कार्रवाई करते हुए:
संबंधित स्कूल पर ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) का जुर्माना लगाया
स्कूल का संचालन तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया
निर्देश दिए गए कि प्रभावित बच्चे को अन्य विद्यालय में प्रवेश दिलाया जाए।

नई शिक्षा नीति 2020 क्या कहती है?
नई शिक्षा नीति 2020 स्पष्ट रूप से कहती है कि:
बच्चों को कम से कम कक्षा 5 तक मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए
बच्चा अपनी घर की भाषा से ही अन्य भाषाएं (हिंदी/अंग्रेजी) बेहतर तरीके से सीखता है
शिक्षा प्रणाली को समावेशी और भेदभाव रहित होना चाहिए
ऐसे में सरगुजिहा जैसी स्थानीय भाषा को आधार बनाकर प्रवेश से इंकार करना, नीति के सीधे-सीधे विपरीत है।

विशेषज्ञों की राय
प्रदीप कुमार शर्मा (शिक्षा कार्यकर्ता) का मानना है कि:
“मातृभाषा में सीखने से बच्चे की समझ, आत्मविश्वास और सीखने की गति बढ़ती है। भाषा कोई बाधा नहीं, बल्कि सीखने का माध्यम होती है।”
बड़ा सवाल
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि:
क्या निजी स्कूल नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए तैयार हैं?
क्या शिक्षा में आज भी भाषा और सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव जारी है?
शिक्षा विशेषज्ञ- प्रदीप कुमार शर्मा ने बातचीत में यह कहा कि सरगुजा का यह मामला सिर्फ एक बच्चे का नहीं, बल्कि उस सोच का आईना है जहां घर की भाषा को कमजोरी समझा जाता है, जबकि नीति उसे सबसे बड़ी ताकत मानती है।
“घर की भाषा से ही सीखने की शुरुआत होती है, और वहीं से दुनिया की हर भाषा तक पहुंच बनती है।”
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