आस्था, प्रकृति और सामाजिक समरसता का अद्भुद संगम — दलहा पहाड़, कोटा- मकरसंक्रांति से 7 दिनों का भव्य मेला

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड में स्थित दलहा पहाड़ न केवल एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आस्था, इतिहास, प्रकृति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक भी है। खड़ी चढ़ाई, घने जंगल, शांत वातावरण और मकर संक्रांति से प्रारंभ होने वाला विशाल मेला इसे पूरे प्रदेश में विशिष्ट पहचान दिलाता है। वर्षों से यह स्थल श्रद्धालुओं, प्रकृति प्रेमियों और सामाजिक चेतना से जुड़े लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है।
भौगोलिक स्थिति और पहुँच मार्ग-
दलहा पहाड़ कोटा विकासखंड के लालपुर गांव में स्थित है। यह स्थान करगीरोड रेलवे स्टेशन के समीप पड़ता है।
बिलासपुर जिला मुख्यालय से दूरी: लगभग 40 किलोमीटर
निकटतम रेलवे स्टेशन: करगीरोड
रेलवे स्टेशन से सड़क मार्ग द्वारा लालपुर गांव होते हुए दलहा पहाड़ तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।
पहाड़ तक पहुँचने का मार्ग ग्रामीण जीवन, जंगलों और प्राकृतिक दृश्यों से होकर गुजरता है, जो यात्रा को अपने आप में एक अनुभव बना देता है।
ऊँचाई, संरचना और ट्रेकिंग का रोमांच-
दलहा पहाड़ की ऊँचाई लगभग 800 से 850 मीटर मानी जाती है। पहाड़ की चोटी तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं और यात्रियों को लगभग 565 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
इन सीढ़ियों में कहीं सीधी तो कहीं घुमावदार चढ़ाई है, जो श्रद्धा के साथ-साथ शारीरिक सहनशक्ति की भी परीक्षा लेती है।
चोटी पर पहुँचने के बाद कोटा नगर, आसपास के गांव, जंगल और पहाड़ियाँ एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती हैं। यह स्थान इतिहास और आस्था के साथ-साथ ट्रेकिंग और रोमांच पसंद करने वालों के लिए भी विशेष आकर्षण रखता है।

धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक वातावरण-
दलहा पहाड़ पर स्थित मंदिर, मुनि आश्रम, यज्ञशाला और ऋषि–मुनियों के आश्रम इस स्थल को गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं। यहाँ लोग केवल पूजा–पाठ के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति और आत्मिक सुकून की तलाश में भी आते हैं।
इस स्थल की एक विशेष पहचान यह भी है कि यहाँ सतगुरु गुरु घासीदास जी के उपदेशों को मानने वाले समाज के जैतखाम स्थापित हैं।
“मनखे–मनखे एक समान” की भावना यहाँ केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाई देती है। दलहा पहाड़ सभी धर्मों और समुदायों के लोगों को एकता और समरसता का संदेश देता है।

बिंझवार समुदाय और दलहा बाबा की आस्था-
दलहा पहाड़ का धार्मिक महत्व बिंझवार समुदाय के लिए विशेष रूप से गहरा है। इस समुदाय में दलहा बाबा को इष्ट देवता के रूप में पूजा जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही यह आस्था इस पहाड़ को केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामुदायिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का केंद्र बनाती है।

प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय महत्व-
दलहा पहाड़ चारों ओर से घने जंगलों, हरियाली और प्राकृतिक शांति से घिरा हुआ है। यहाँ की हवा, वातावरण और प्राकृतिक दृश्य मन को सहज ही मोह लेते हैं।
विशेषकर बरसात के मौसम में पहाड़ की हरियाली, बादलों की आवाजाही और वन्य वातावरण इसकी सुंदरता को और बढ़ा देता है।
यह स्थान यह भी संदेश देता है कि प्रकृति और आस्था एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
ऐतिहासिक स्मृतियाँ और जनमानस की आस्था-
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता बैकुंठनाथ जायसवाल बताते हैं कि उनके पिता वर्ष 1970 से 1980 के बीच सीमित परिवहन संसाधनों के समय इसी मार्ग से आना–जाना करते थे।
जब वे ट्रेन पकड़ने जाते थे, तो इस पहाड़ की ओर देखकर प्रणाम करते, यहाँ रुकते, पानी पीते, कुछ देर विश्राम करते और फिर आगे बढ़ते थे। उस समय यह पहाड़ लोगों के लिए आस्था और भरोसे का प्रतीक था।
विकास की शुरुआत: पानी और बसाहट-
वर्ष 1989 में जब बैकुंठनाथ जायसवाल सरपंच बने, तब उन्होंने दलहा पहाड़ मार्ग के मुख्य द्वार के पास पहला बोर खनन कराया।
उस समय राजीव गांधी जलग्रहण मिशन के अंतर्गत आस्था मिशन चल रहा था। इस योजना के तहत पंचायत और आसपास के क्षेत्रों में 51 बोरिंग कराई गईं। इससे पानी की सुविधा बढ़ी और धीरे–धीरे लोग यहाँ बसने लगे।
सीढ़ियों का इतिहास-
इसी दौर में तत्कालीन एसडीएम आशुतोष अवस्थी ने बैकुंठनाथ जायसवाल के आग्रह पर पहाड़ के नीचे से ऊपर की ओर 106 सीढ़ियों का निर्माण कराया।
समय के साथ यह क्रम बढ़ता गया और आज यही सीढ़ियाँ 565 सीढ़ियों के रूप में मंदिर तक पहुँचने का सशक्त मार्ग बन चुकी हैं।


मंदिर निर्माण की रहस्यमयी कथा-
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, 1972 के आसपास एक संत महात्मा दलहा पहाड़ पर आए थे। वे मौन व्रत धारण किए हुए थे।
चरवाहों द्वारा सूचना मिलने पर गांव के मुखिया और ग्रामीण उनसे मिले। संत ने संकेतों के माध्यम से बताया कि उनका संकल्प इस स्थान पर मंदिर निर्माण का है।
उस समय संसाधनों की भारी कमी थी, लेकिन आस्था प्रबल थी।
बैलगाड़ियों के माध्यम से सीमेंट, रेत और निर्माण सामग्री पहाड़ की चोटी तक पहुँचाई गई
ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर निर्माण शुरू हुआ
निर्माण कार्य के दौरान एक दिन वह संत बिना किसी को बताए अचानक चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए।
आज भी ग्रामीणों का मानना है कि वे कोई अवतारी पुरुष थे, जो संकल्प पूर्ण होते ही अंतर्ध्यान हो गए। यह कथा आज भी लोगों की आस्था को और मजबूत करती है।
दलहा पहाड़ मेला: 3 दिन से 7 दिन तक का सफर-
पहले दलहा पहाड़ का मेला केवल 3 दिनों का होता था।
वर्ष 2003 में पहली बार तत्कालीन प्रथम विधानसभा अध्यक्ष पंडित राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला को आमंत्रित कर भव्य मेला आयोजन और उद्घाटन कराया गया।
इसके बाद मेला निरंतर विस्तार करता गया।
आज यह मेला हर वर्ष 14 जनवरी (मकर संक्रांति) से प्रारंभ होकर 7 दिनों तक चलता है।
इन सात दिनों में लाखों श्रद्धालु दूर–दूर से दर्शन, पूजा और मेले का आनंद लेने पहुँचते हैं।

बैकुंठनाथ जायसवाल: विकास और संरक्षण का संतुलन
बैकुंठनाथ जायसवाल, जो वर्तमान में दलहा आस्था सेवा समिति के सक्रिय सदस्य हैं, बचपन से राजनीति और सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं।
वर्ष 1989 से पंच, सरपंच और जनपद अध्यक्ष जैसे दायित्वों पर रहते हुए उन्होंने दलहा पहाड़ और मंदिर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वे सादगीपूर्ण जीवन में विश्वास रखते हैं और जल, जंगल और जमीन के संरक्षण को ईश्वर आराधना से जोड़कर देखते हैं।
उनका मानना है—
“पत्ते–पत्ते में भगवान है। दलहा पहाड़ की प्रकृति में ही ईश्वर का वास है।”
इसी सोच के साथ वे मंदिर परिसर के विकास के साथ-साथ जंगल, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए भी लगातार प्रयासरत हैं।
आमंत्रण
दलहा पहाड़ मेला 14 जनवरी से 7 दिनों तक आयोजित किया जा रहा है।
दलहा आस्था सेवा समिति और स्थानीय ग्रामीणों ने प्रदेशवासियों से अधिक से अधिक संख्या में पहुँचकर इस आस्था, प्रकृति और सामाजिक एकता के महापर्व में शामिल होने का आह्वान किया है। कार्यक्रम की अधिक जानकारी कर लिए संपर्क करें- बैकुंठनाथ जायसवाल-(दलहा आस्था सेवा समिति) +919893360179,
— प्रदीप शर्मा की रिपोर्ट
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